दिन तो गुजर जाता है गुजरती नहीं रात

करवट बदल बदल कर है बीत रही रात


जब तुम ही मुँह फेर लिए हो हमसे, फिर

कौन सुनेगा किससे कहें अपनी जज्बात


परेशानी बताओ क्यों हो इतनी उदास ?

घर वाले नही मानेंगे बस इतनी सी बात


मुझे तो सिर्फ तुम्हारा राजीनामा चाहिए

तब देखेंगे क्या कहता है तुम्हारा जमात


तुम्हे भरोसा रखना होगा अपने इश्क पर

पूरी होगी अपनी भी आरज़ू-ए-मुलाक़ात

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©पुरुषोत्तम