देखे हरदम तिरछी नजरें, मंद-मंद मुस्काए,

उसका ये अंदाज़ निराला मेरे मन को भाए,

मन में होती उथल-पुथल, चेहरा फूल सा खिल जाए,

इसी खेल-खेल में दिन सारा ढल जाए ।


उसके बदन की भीनी खुशबू रोम-रोम महकाए,

मिले अंग से अंग तो अंग-अंग मुस्काए,

होऊं जब आगोश में तन-बदन पिघल सा जाए,

फिर हर एक कतरा मिल एक हो जाएं।।

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©पुरुषोत्तम