देखे हरदम तिरछी नजरें, मंद-मंद मुस्काए,
उसका ये अंदाज़ निराला मेरे मन को भाए,
मन में होती उथल-पुथल, चेहरा फूल सा खिल जाए,
इसी खेल-खेल में दिन सारा ढल जाए ।
उसके बदन की भीनी खुशबू रोम-रोम महकाए,
मिले अंग से अंग तो अंग-अंग मुस्काए,
होऊं जब आगोश में तन-बदन पिघल सा जाए,
फिर हर एक कतरा मिल एक हो जाएं।।
×××
©पुरुषोत्तम


