सन सैन्तालीस मे हुआ था हमारे राष्ट्र मे एक उजियारा।

जब हुआ था स्वंतत्र भारतवर्ष हमारा।

फिर भी नहीं मिला उसे अबतक किनारा।

फिरता है वह मारा-मारा ।

लिए हाथ मे कटोरा बिताता वह दोपहर सारा।

पेट को नहीं अब पीठ का भी सहारा।

फिर भी नहीं मिला उसे एक जून का चारा ।

रहने को घर नहीं फुट-पाथ का लिया सहारा।

जीने को दिल नहीं करता,

फिर भी जिन्दगी जीने को विवश है बेचारा।