आदत तुमने हीं बिगाड़ा है अब तुम्हीं झेलो

ये रेशमी और मखमली चादर नहीं लुभाती।

सिरहाने रखा करो अपनी बाहों का तकिया

कि बिना इसके मुझे अब नींद नहीं आती।

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©पुरुषोत्तम