आदत तुमने हीं बिगाड़ा है अब तुम्हीं झेलो
ये रेशमी और मखमली चादर नहीं लुभाती।
सिरहाने रखा करो अपनी बाहों का तकिया
कि बिना इसके मुझे अब नींद नहीं आती।
×××
©पुरुषोत्तम


आदत तुमने हीं बिगाड़ा है अब तुम्हीं झेलो
ये रेशमी और मखमली चादर नहीं लुभाती।
सिरहाने रखा करो अपनी बाहों का तकिया
कि बिना इसके मुझे अब नींद नहीं आती।
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©पुरुषोत्तम