चुप्प! चुप्प! चुप्प!

है अन्धेरा घना कुप्प।

शोर नहीं, है सुनापन, 

चिर रहा है अन्तर्मन।

दृश्य नहीं ये दर्पण है, 

करवाता कर्मों का तर्पण है।

कर्म किये जो भी अच्छे-बुरे

हैं चुपचाप बस मौन खड़े।

न्यायालय खुद का, न्याय भी

बतला खुद हीं ,क्या तू हुआ बरी? 


#पुरुषोत्तम