फैली हो सुगंध चाहे दुर्गंध,

फर्क करना मुझे आता है।

खट्टा, मीठा या हो चटपटा,

स्वाद चखना मुझे आता है।।


फूल बिछे हो राहों में या कांँटे,

देखकर चलना मुझे आता है।

आस्तीन के सांँपों संभल जाओ,

फन कुचलना मुझे आता है।।

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© पुरुषोत्तम