कितना खूबसूरत एहसास है ये इश्क भी !

कभी नींद भरे आँखों को सोने नहीं देती

कभी आंसूं भरे मन को रोने नहीं देती

कभी दिसंबर की कंपकंपाती रातों में

बदन को अपनी सर्द हवाओं से और ठिठुरा देती है

तो कभी जून के चिलचिलाती धूप में

अपनी आगोश की गर्म स्पर्श से नस तक को जला देती है

कभी भविष्य की असंख्य कल्पनाओं में डूबा मन

वर्तमान की सुध लेना भी छोड़ देता है

तो कभी अतीत का वो एक लम्हा

भविष्य की सारी कल्पनाओं का आधार बन जाता है

कभी वस्ल की ख़ुश तन को रोमांचित कर देता है

तो कभी हिज्र के आंसूं आँखों को भर देता है

कभी तस्वीरें सच लगने लगती है

तो कभी आइनों में फरेब नजर आने लगता है।

कभी कोई अजनबी इतने करीब जाता है

कि सारे अपने दूर नजर आने लगते हैं

तो कभी किसी कि आँख इतनी भा जाती है

कि अपने ख्वाब धुंधले नजर आने लगता हैं।

कभी एक चाँद इतनी प्यारी लगने लगती है कि

आसमान के उन करोड़ों तारों पर नजर ही नहीं जाता

जो रौशनी देते हैं चाँद को तफ्सील करने में

कभी काँटों भरे इसके रस्ते

सिर्फ पैरों को ही नहीं मन को भी छलनी कर देता है

और फिर एक दिन इश्क करने वाला मर जाता है

ये कहते हुए कि

कितना खूबसूरत एहसास है ये इश्क़ भी !!!!