अकेले निकला नहीं 

कभी किसी सफर पर ,

पकड़ लो मेरा हाथ 

के डर लगता है। 


रस्म-ए-उल्फत 

अकेले निभानी है मुश्किल ,

दे देना तुम भी साथ 

के डर लगता है 


एक तुम हो यहां

एक मैं हूँ यहां 

और कोई भी तो नहीं ,

बड़ी खामोश है ये रात 

के डर लगता है 


पुराने रिश्तों में 

रिश्तों की नई कोंपलें उगानी है 

बड़ी उलझी हुई है ये गाँठ 

के डर लगता है