हाथों में चूडियां थी बालों को खुला रखा था 

कुछ इस तरह से उसने खुद को सजा रखा था ।


बादलों से डर लगता था उसे सो हमने 

उसको शाम से ही सिने से लगा रखा था ।


उसकी   ही   शिक़ायत  उसी से  करते थे 

उसको ही अपना जज,वक़ील सब बना रखा था ।


जमाने के आँखों में चुभता था उसका मेरे साथ होना 

सो  हमने  उसे अपने  आँखों में बसा रखा था ।


मुझे देर हो रही थी पर मैं जा नहीं पा रहा था 

उसने मेरे हाथों को अपने हाथों से दबा रखा था ।