तुमने मेरे लिये गढ दिए

चरित्र के समस्त आयाम

पीढियों ने तय कर दिए

हमारे शील और आचरण

परम्पराओं ने उपहार में दिए

व्रत, उपवास और ढेरों नियम

ताकि वहन कर सको

तुम अपना स्वतंत्र जीवन

और इन बन्दिशों में जीकर

मैं भूल गई अपना जीवन

तुम्हारे सपनों को जीवन्त कर

मैं भूल गई अपना सृजन

क्यों न ,अब तय करें स्वयं

 अपना शील और आचरण ??

ज्यादा से ज्यादा क्या होगा ..?

मत कहना घर की लक्ष्मी मुझे

मत देना आदर्श का तमगा मुझे 

मत कहना त्याग की प्रतिमूर्ति मुझे

मत कहना सहनशील मुझे

मुझे भी तो समझने दो

क्या है मेरी सोच ...,

और क्या है मेरा विवेक

संवेदनाएं मेरी मरी नहीं है 

 महसूस होती है अभी भी मुझे 

वो बेचैनी वो छटपटाहट 

जिसे अक्सर बनते देखा है

कभी मेरी बेबसी का सबब

तो कभी मेरी घुटन का सबब 

जाने भी दो अब

मत चलाओ मुझपर

तुम अपने संस्कार के वाण

क्यों न, अब  तय करें स्वयं

अपना शील और आचरण

करने दो मुझे भी

मेरे शब्दों का चयन

होने दो अभिव्यक्त

थोड़ा मेरे भी भावों को

बहने दो मुझे भी

उन्मुक्त - उच्छृंखल

हंसने दो मुझे बेरोक-टोक

मेरी ये धवल हंसी

सिर्फ मेरी है

नहीं है यह तुम्हारे लिए

कोई आमंत्रण का पर्याय 

मेरा प्रेम प्रदर्शन 

है मेरी कोरी भावना

नहीं लगाता यह

मेरे चरित्र पर प्रश्नचिन्ह 

जीने दो बेबाक-बेखौफ

गढ़ने दो मुझे मेरा व्यक्तित्व

करने दो मुझे भी

थोड़ा स्वयं पर अभिमान

क्यों न, अब तय करें स्वयं

अपना शील और आचरण

मत देखो मुझे

अपनी ओछी नजरों से

मत आँको मुझे

मेरे कपड़ों की साईज से

मत झांको मुझे

मेरे कपड़े से इतर

मत देखो मेरा बेबाक लहजा

रोकना है तो रोक लो

अपने घर के दुशासन को

जो न कर पाए फिर

किसी निर्बल का चीर हरण

मुझमें भी बसा है आन मेरा

है द्रोपदी सा अभिमान मेरा

फिर भी नहीं बनना

महाभारत का सूत्रधार मुझे

नहीं चाहिए मुझे कोई

तुम्हारा सिन्दूर का सुरक्षा चक्र

करने दो मुझे भी 

अपने जीवन का भरण पोषण 

क्यों न, अब तय करें स्वयं

अपना शील और आचरण

मेरे प्रणाम में मिलता है मुझे

सौभाग्य वती होने का आशीर्वाद

जिसमें छुपा होता है

तुम्हारी लम्बी आयु का वरदान 

तुम्हारे लिए मैं प्रशस्ति का मार्ग ढूँढू

जप-तप, व्रत-उपवास मैं करुँ

मेरे कठोर नियम मानो

बन जाते हैं तुम्हारे लिए

कोई अभेद्य सुरक्षा कवच

अहिल्या का मौन बनकर

नहीं जीना मुझे

शिला बनकर नहीं है

राम का इन्तजार मुझे

न मंजूर कोई अग्नि-परीक्षा

ना करना सीता सा बलिदान

न मंजूर अपनी आहुति

न मंजूर यशोधरा सा जीवन

अपनी शर्तों पर

मुझे जीना है यह जीवन

क्यों न, अब तय करें स्वयं

अपना शील और आचरण

मैं हूँ मोहिनी

पर मैं कोई वस्तु नहीं

मैं हूँ योगिनी

पर अभिशप्त नहीं

मैं हूँ अभिमानिनी

पर अचल संपत्ति नहीं

न है इच्छा कोई

सती के विध्वंश की

न ही इच्छा कोई

शिव-तांडव के आधार की

मैं अबला हूँ , तो शक्ति भी हूँ 

मैं स्त्री हूँ , तो जननी भी हूँ 

हूँ धरती की आधारशिला

करती हूँ जीवन का मंथन

हँसकर करती हूँ , हर पल

नए जीवन का सृजन 

तो क्यूं न, अब तय करें स्वयं

अपना शील और आचरण !!