न हो कोई मेरा दिन

न कोई दिन तुम्हारा हो

मैं तो चाहूँ बस इतना

कि न हर दिन हमारा हो

ये हफ्ते, महीने क्या

पूरा साल भी हमारा हो !


हर जश्न का दिन हो

नारी का

हर सेवा का दिन हो

पुरुष का

थोड़े तुम बस जाओ मुझमें

मैं थोड़ी बस जाऊँ तुझमें

मैं तो चाहूँ बस इतना

कि हर दिन हर घड़ी

पुरुष और प्रकृति का साथ रहे !


हर कोना गूंजे

हाथों की खनकती चूडियों से

हर कोना सुवासित हो

तुम्हारी डियो वाली खुशबू से

मैं तो चाहूँ बस इतना

कि हर कोना इस घर का

सुनाता अपनी दास्तान रहे !


जब तुम नहीं रहो घर में

तो मेरी नजरें करे

सिर्फ तुम्हारा इंतजार

और जब मैं ना रहूँ

तो घर का जर्रा जर्रा

मेरी राह तके बार बार

मैं तो चाहूँ बस इतना

मेरे हर सफर में

हमसफर बस मेरे साथ रहे  !


मैं रहूँ हर पल साथ तुम्हारे

हर फैसले में बनूं तुम्हारी भागीदार

तुम रहो हर क्षण साथ मेरे

घर के काम में भी

बन जाओ मेरे साझेदार

मैं तो चाहूँ बस इतना

हर पल हर क्षण बस

इन हाथों में तुम्हारा हाथ रहे


न हो मुझे कोई उलझन

तुम्हारे किसी फैसले से

न तुम्हें कोई परेशानी हो

मेरे किसी हौसले से

मैं तो चाहूँ बस इतना

कि हमारे इस मन्दिर में

अर्धनारीश्वर का वास रहे !


न सुलगे घर कोई

मातृ सत्ता की आंच से

न खौफ हो जहाँ

पितृसत्ता की कठोरता की

मैं तो चाहूँ बस इतना

कि हर घर में भी एक

लोकतंत्र की साझा सरकार रहे ।


न मैं अपना वजूद खोऊँ 

तुम्हारे अभिमान में

न तुम्हारी पहचान खोए

मेरे सम्मान में

मैं तो चाहूँ बस इतना

कि मेरे अस्तित्व की रक्षा में

तुम्हारे व्यक्तित्व का सम्मान हो ।



पिता की शक्ति में

सहिष्णुता का भी लाड़ हो

माँ की करुणा में

पराक्रम का भी तेज हो

मैं तो चाहूँ बस इतना

कि घर के हर एक कण में

शान्ति समृद्धि का वास रहे ।



मातृत्व की विनम्रता में

सही गलत की परख हो

पितृत्व के पुरुषार्थ में

कोमलता का हाथ हो

मैं तो चाहूँ बस इतना

कि अनुशासन के मंच पर भी

मन की बात रखने का साहस रहे !


नारी की शक्ति में

पुरुष का साहचर्य रहे

पुरुष की करुणा में

स्त्री का पुरुषार्थ रहे

मैं तो चाहूँ बस इतना कि

सुख दुख हमारे साझे हो

और हर सदी, हर युग में

तुम्हारा मेरा साथ रहे  !