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"माँ की जुबानी"

कल की हस्ती खेलती आज आंसुओं में डूब गई

आज एक शब्द बोलने पर भी वो सिसक गई

खुद को मार दे या लड़ ले वो समाज से

मन का दुख बताए तो रोक न पाए खुद से !!


लाख मिन्नतें सुनकर भी रुके ना कातिल वो

चीर कर ले गए उसके हर एक अश्रु को

इंसानियत की सारी हदें कर दी पार

जानवरों सा साथ कर गए व्यवहार !!


नौ महीने रख कोख में, जिसको इतना प्यार दिया

किसी और ने ही मेरी बेटी को मुझसे छीन लिया

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