तबाही

इधर सिर-चढ़ आ गई है तबाही

पर उधर चल रही साहब की वाह- वाही !

मुद्दे से भटकाने का हर प्रयास है जारी

फ़िजूल के भाषणों की आने वाली है अब बारी


                                     

इधर सिर-चढ़ आ गई है तबाही

पर उधर साहब ने चालाकी से चुप्पी है साधी

चुनाव की पास आने वाली है तारीख़

खेली जानी है फिर उन्हीं झूठें वादों की बाजी


इधर सिर-चढ़ आ गई है तबाही

पर उधर साहब की चापलूसी है जारी

न जाने कितनी जाबें हैं आज भी खाली

लेकिन कहें हमसे जाओ पीटो खाली थाली


इधर सिर-चढ़ आ गई है तबाही

पर उधर साहब के सीने की चर्चा है जारी

ख़बरें अब सिर्फ़ वो हैं दिखाई जाती

जिसमें होती मिर्च- मसाले की मात्रा भारी



इधर सिर-चढ़ आ गई है तबाही

पर उधर साहब की वही वाली बातें हैं जारी

लोकतंत्र में उनकी तो है ही जिम्मेदारी

पर हम सबकी उसमें कुछ तो बनती है भागीदारी........


-पुलकित