न थकी हूं मैं

न झुकी हूं मैं

लाख बाधाओं को देख कर भी

न रुकी हूं मैं ।

कभी मां के गर्भ में,

कभी दहेज की अग्नि में

कई बार खत्म करना चाहा तूने

फिर भी

पापा की पलकों में पली हूं मैं ।

हाथों से छीना जब-जब कलम तूने

तब-तब मीराबाई और महादेवी बनी हूं मैं ।

अबला समझ अन्याय किया जब तूने

झांसी की रानी बन लड़ी हूं मैं ।

कभी दुर्योधन के आगे बेसहारा बनी

कभी सीता बन जली हूं मैं ।

इज्जत के नाम पर हर बार गिराया तूने

पर बार-बार उठकर हुई खड़ी हूं मैं ।

कभी मैं थी आठ साल की,

कभी महज आठ माह की,

कभी चलती बसों में,

कभी सुनसान राहों में,

तेरा शिकार बनी हूं मैं ।

फिर भी समाज की अदालत में

दोषी रही हूं मैं ।

अपनी हर दरिंदगी पर

मेरे पहनावे पर प्रश्न उठाया तूने

उसी पोशाक में खड़ी अपनी बहन में,

तुम्हें क्यों नहीं दिखी हूं मैं ?

लड़की है क्या कर सकती है

कहकर हर बार प्रश्न उठाया तूने

इससे बड़ा प्रमाण क्या दूं

कि तुम सबको जनी हूं मैं ।।