त्याग कर अपनी सुख और शांति को,

लगे हैं जुटाने में कल की कांति को ।

सुकून से भविष्य में सोने को,

तैयार हैं अपनी नींद भी आज खोने को ‌।

बेहतर बनाने की चाह में अपने कल को

जीना ही छोड़ दिया आज के इस पल को ।।


मजबूत किया धन, संपत्ति और और बल को,

जो रह गई कसर कोई, इस्तेमाल किया छल को ।

मिटाने के लिए अपने कल के दुख को,

चढ़ा रहे हैं बलि आज के सुख को ।

बेहतर बनाने की चाह में अपने कल को

जीना ही छोड़ दिया आज के इस पल को ।।


करने साकार अपने उस घर बनाने के सपने को,

बस रहे हैं कहीं दूर छोड़ सभी अपने को ।

कल दो वक्त सुख की रोटियां तोड़ने को,

आज भर रहे हैं आधा पेट कुछ रुपया जोड़ने को ।

बेहतर बनाने की चाह में अपने कल को,

जीना ही छोड़ दिया आज के इस पल को ।।


दबाकर किसी कोने में अपनी अधूरी इच्छाओं को,

कर रहे हैं पूरा इन सामाजिक परीक्षाओं को ।

हाथों में समेटे अपने अधूरे सपने को,

हो रहे हैं तैयार उन्हें बच्चों पर थोपने को ।

बेहतर बनाने की चाह में अपने कल को,

जीना ही छोड़ दिया आज के इस पल को ।।


कर रहे हैं विचार कल खिलखिलाने को,

पर भूल गए आज फिर मुस्कुराने को ।

दिन-रात एक किया आज जो पैसा जमाने को,

कल रहना तैयार सब यहीं छोड़ जाने को ।

बेहतर बनाने की चाह में अपने कल को,

जीना ही छोड़ दिया आज के इस पल को ।।