रुप हैं कई,
कई हैं इनके रंग,
आचरण भी कई,
कई हैं जीने के ढंग,
जरा भी पर
तुमसे भिन्न नहीं
देखकर हूं मैं दंग ।
स्वभाव इनका भी
कुछ तुम सा है,
सरे आम नोचते हैं
एक दूसरे को
वर्चस्व बनाने को कभी,
कभी कुछ हथियाने को ।
फर्क बस इतना सा है,
घूम रहे आजाद ये
और
तुम हो पिंजरे में बंद ।
हैवानियत से इन्होंने
सुंदर जगत को भी
बना दिया है
चिड़ियाघर ।।
