बगीचे के बीच बनी
उस बेंच पर बैठ
जब भी तुम्हें देखता हूँ
तो अनवरत ख़याल
मेरे मस्तिष्क में दौड़ लगाते हैं
जैसे विगत कई वर्षों से
अपनी स्थिरता लिए
मानो किसी के आने का
इंतज़ार कर रहे हो तुम..!
जो आये तुम्हारे पास
और आकर भर ले
तुम्हें बाहों में..
बाँध ले तुम्हें प्रेम में
बैठ जाये तुम्हारी छाया में
और लीन हो जाये प्रेम में..
मिलन की ललक ने
तुम्हें दीर्घायु बना दिया है
तुम्हारा प्रेम भी अद्भुत है
जाहिर नहीं होने देते
चुपचाप ही..
अपने प्रेम पुष्प खिलाकर
मन ही मन
लहलहा उठते हो तुम..!
प्रेम का रंग
कुछ इस क़दर
गहराता है तुम पर
की हर वसंत
तुम धानी हो जाते हो
फिर हरे..
फिर थोड़े और गहरे हरे..
अपने साथ साथ
औरों का भी जीवन
प्रेम से हरा कर रहे हो तुम..!
तुम्हारे इस प्रेम और संयम ने
ख़ुद में.. ईश्वर को भी
समाहित कर लिया है
तुम्हारे मूल, तने, शाखाओं
और पत्तियों में..
विष्णु, केशव, नारायण
और श्रीहरि का निवास है
ईश्वर और ईश्वरीय प्रेम का
स्वरूप हो तुम..!
इस अलौकिक प्रेम की
छाया में बैठ
स्पर्श कर तुम्हें..
अपनी अन्त: चेतना को
पुलकित और प्रफुल्लित कर
ब्रह्नलीन होना चाहता हूँ
मैं भी होना चाहता हूँ
प्रेम में पीपल..!

© प्रशांत सिंह