मैं बेज़बाँ हूँ हलक़ तलक मेरी जीभ कट चुकी है मैं बेज़बाँ हूँ!   ज़बां थी जब तो मैं चीख़ता था बड़ी उलटी-सीधी बातें ये मेरा मुल्क और उसकी उलझन सियासी दांव-पेंच, उसकी गिरहें बंधी है जिसमें न जाने कितने जात-पात, धर्म, भाषा के नाम दंगे वो इक पुरानी बेकार मसलों की फुलझड़ी भी ग़रीबी, बेरोज़गारी और ज़िहालत जो हुक्मरानों के सर पे मैं फोड़ने चला था   हमारे पुरखों की है ये विरासत तो कैसे इसको हम ख़त्म कर दें   हमारी बरसों की नाज़ां तहज़ीब कब की सड़ चुकी है न औरतें न बच्चे महफूज़ हैं यहाँ अब न हममें इंसानियत ही बची है मगर हमारा ग़ुरूर ही हमारी आबरू है   ये चंद बेकार से मसायल के शोर-व-गुल से कई लोग थे परेशां बड़ी शिकायत थी उनको मुझसे की दूसरों की सुकूं भरी ज़िन्दगी में खलल मैं डालूं ये तहज़ीब की बात तो नहीं है सो मैंने ख़ुद ही ज़बान अपनी है काटकर के फेंकी तो अब मैं बेज़बाँ हूँ   हाँ! मगर मैं अब भी कभी-कभी दिल को चाक करने वाली बातें सुनकर कुछ-एक कड़वे अलफ़ाज़ लिखके फेंकता हूँ की आखिर अब मैं बेज़बाँ हूँ...!!