मेरे कमरे की इक दीवार में इक खिड़की रहती थी एक कैनवस-सी खिड़की सतह पे जिसके मौसम के अलग मंज़र थे, उगते थे   मेरे कमरे में वो कैनवस-सी खिड़की दिखाती थी ठिठुरते ठण्ड में, बर्फीले चादर पर दो नंगे पाँव को चलते हुए, भड़कीले बच्चे को जो पूरी शब उसी चादर की तह में काट देता था मैं कमरे में ठिठुरता था   मेरे कमरे में वो कैनवस-सी खिड़की बताती थी तपिश गर्मी की सूखे चट्टान-से चेहरे जो अक्सर क्रैक करते थे, सराबों में लगाते डुबकियां और जलते वो प्यासे लोग जिनके जिस्म में कतरा लहू न था   मेरे कमरे में वो कैनवस-सी खिड़की सुनाती थी कि बारिश से ज़मीं डूबी हुई है और इक छोटे-से बच्चे को बचाने के लिए माँ लड़ रही लहरों से, टकराती है पेड़ों से चंद लम्हों में दोनों डूब जाते हैं   तो मैंने कमरे की वो कैनवस-सी खिड़की बदल डाली है मोनालिसा के पेंटिंग से मैं बिलकुल उस जहां से बेख़बर हूँ अब....!!