सालों-साल की फसल लगी थी
अब कटने की बारी आयी
फसल पके तो कट जाते हैं
फसलों की ख़सलत यही है
किस हथियार से कौन कटेगा
ये तो फ़क़त ख़ुदा ही जाने
लेकिन ये इंसानी फसल है
बूढ़े, बच्चे और जवां
सब शामिल हैं, संग रहते हैं
पर पिछले कुछ सालों से
कुछ इंसान जो हुक्मरान हैं
अलग-अलग शहरों-मुल्कों के
नए-नए हथियार और नयी तरकीबों से
इंसानी फसल को काट रहे हैं
इनको फर्क नहीं पड़ता है
बूढ़े, बच्चे और जवां से
चाहे फिर वो कोई मुल्क हो
कोई शहर हो या कोई मज़हब
फसल ही तो है
बस काटते चलो
नौजाईदा बच्चों के पैदा होते ही
रोने की अब वजह यही है
कैसी ज़मीं और किस मख़लूक़
के दरमियान वो पैदा हुए हैं
सर उठते ही कट जाएंगे
इंसां अब
अशरफ़ मख़लूक़ नहीं है...!!