चाय की प्याली में वो सिमटी हुई
छः साल की बच्ची
उम्र की कच्ची मगर
काम की पक्की भी बहुत है
बाप की मार ने यूँ उम्र से काफ़ी पहले
माँ के हर फ़र्ज़ का चोगा उसे
पहना ही दिया है
सुबह से शाम तक
भट्टी में सुलगती हुई बच्ची
और शराबों के कड़वे झाग में
बुझता हुआ वो बाप
लोग कहते हैं
बासी बस्तियों के झोल से बच्चे
उम्र भर यूँ ही टंगे रहते हैं
चायख़ानों में
उस मकड़-जाल में
जो पैदाईशी ग़रीबी से मिली है
और मैं सोचता हूँ
आज फ़रिश्ते बहिश्त के
जलते-बुझते हुए चीथड़ों में
सड़क पे वो हैं मिलते।।