जो पत्तों की मानिंद सब ही की ज़बां से झरते हैं हम जिनकी जुगाली करते हैं   कुछ लफ़्ज़ हैं जो नश्तर की तरह चुभते हैं, ज़ख़्म ही देते हैं कुछ लफ्ज़ हैं जो दूजे के लिए हर वक़्त दुआएं करती हैं लफ़्ज़ों से जंग हुई कितनी दिल भी टूटे, दुनियां उजड़ी और लफ़्ज़ों ने ही बख़्शी है कई बार अमन-आमान हमें   सोचो गर सारी उम्र हमें इक हद तक लफ़्ज़ मयस्सर हो बेकार में जिनको ख़र्चों अगर तो उम्र घटे   फिर क्या होगा?