इक ज़िन्दगी में कितना ही जिता है आदमी 

मरने से कई पहले हि मरता है आदमी 

 

इक कौड़ी का आदमी हैं करोड़ों का आदमी 

इस बाज़ार में बिकता हर क़ीमत का आदमी 

 

दर बदर जो रासतो पे घूमता है दिख रहा 

असलीयत में किसी घर का सहारा है आदमी 

 

किसी फटे कुर्ते में बे-रंग सी मिज़ाज 

फज़ुल कल के सपने बनता है आदमी 

 

ग़ैर तो दुनियाँ ने कब का ही कर दिया 

हालत ए हाजीरा में खुद से ग़ैर आदमी