बचपन बीता और जवानी बीत रही
एक तुझको रिझाने के चक्कर मे
सारी सखियां तेरी रीझ रही
पर संगमरमर सी सुंदर तुम
संगमरमर सी ही बनी रही
मैं प्रेम गीत गाता रहा तू
तू मौन खड़ी सुनती रही
पत्थर की मूरत तुम
पत्थर की ही बनी रही

मेरे मन के गीत जिसे तुम सुन न सकी
प्यार के दो मीठे बोल कह न सकी
अब उन आहों को उन रातों को
तन्हाई के उन गीतों को ये दुनिया सारी सुन रही
पत्थर की मूरत तुम पत्थर की ही बनी रही

मेरे ही गीत तेरा प्रियवर तुझे सुनाता है
जिसपर दिल तूम हार रही सुनकर जिसको  रीझ रही
तूम हार गई मैं जीत गया तेरी प्यारी बिटिया भी
अब मेरे ही  उन नगमों से अपना किस्सा गढ़ रही
पत्थर की मूरत तुम पत्थर की ही बनी रही

बचपन और जवानी जैसे
तुझ बिन जिंदगी भी बीत रही
पर संगमरमर सी सुंदर तुम
संगमरमर सी ही बनी रही
पत्थर की थी मूरत  तुम
पत्थर की ही बनी रही