जन्म दिया था माँ ने जीवन पाया है गुरुवर आपसे | उसने अमृत पिलाया पुस्त बनाया , ज्ञान रस का पान कराया आपने | इस जीवन का मोल चुकाया जाये कैसे , अमर ये ज्ञान पाया गुरुवर आपसे | जगमगा रहा था संसार , सूरज की किरणों से | पर कूप अँधेरा था कही मेरे मन में , चमक उठा मेरा अंतरंग भी , पाया जो गुरुवर ज्ञान प्रकाश आपसे | जन्म से जंतु थे हम भी , ठोक-बजा के इंसान बनाया आपने | राष्ट्रहित में शीश चढाउँ , प्रेम से जो बोले कोई , बाहें फैला गले लगाऊ, इतनी विनम्रता इतना साहस, गुरुवर आपसे ही पाऊँ | उपमा क्या दूँ आपकी कण -कण ऋणी है आपके , क्या राजा क्या रंक, सबको तरना है गुरुवर आपसे , इस भवसागर से कैसे पार निकले , मार्गदर्शन की अपेक्षा है गुरुवर आपसे |