कमल की पंखुरी सी नयनों वाली , कहाँ से आई है तू , ऐसा लगता है जैसे , उस चाँद की परछाई है तू | लिए गालो पर सुबह की ललाई , भोर में जैसी साँझ को वैसी , सुख में जैसी दुःख में वैसी . मानो सारी सृष्टि की सुंदरता तुझमें समायी हो जैसी | छवि तेरी चंचल लहरो सी है , ओढे चादर सादगी की , दम्भ नहीं है रूप का , कोमलांगी तभी तो लजाई सी है | श्वेताम्बरी आ रही है मेरी ओर , देख उसे नर्तन करता मेरे मन का मोर दिन में भी फैली रात की स्याही सी है , मानो दुनिया उसकी दो आँखों में समायी सी है |