बेपरवाह पत्ते पत्ते पर शबनम सा बिखरा था
बिठा लिया तूने अपने पलकों पर ,
कर ली मैंने मोहब्बत ,
इस दिल की अनकही शर्तो पर आफ़ताब तब भी था
मुझमे ओस की बूंदो की तरह ,
पर तेरे इश्क़ ने ऐसा तराशा ,
कर रहा हूँ
रौशन मोहब्बत करने वालो की शाम सितारे की तरह |
उन अनकही शर्तो की कीमत हर रोज चुकाता हूँ ,
लिखे थे जो गीत तुम्हारे नाम ,
दुनिया को वही सुनाता हूँ ,
कैसे कहुँ मेरे लिये क्या है तू ,
मेरे गीतों के अक्श उनकी परछाई ,
उनका आइना है तू ,
मेरे शब्दों को घोल के ,
जो कोई चित्र बनाये ,
कैनवास पे उभरी तस्वीर है तू ,
कैसे कहुँ मेरे लिए क्या है तू |