आँगन को बगीया, घर उपवन बनाती है बेटी । लोग मकान बनाते है , उसे घर बनाती है बेटी । बजता नही है थाल घरो में , जनम लेती है जो बेटी । क्यों नही समझते लोग , जीवन को सरस बनाती है बेटी । गूँजने लगता है संगीत घरो में , पायल जब छनकाती है बेटी । जननी बहु बेटी बनकर पत्नी , जीवन से थके मनुज में , नव गति ,नव उर्जा का संचार करती है बेटी । बेटों से ज्यादा प्यारी होती है बेटी । एक दिन छोड़कर सबको जाती है बेटी , कभी न रोया जो बाप , उसको भी रुलाती है बेटी । देखो इन नदियों को , पत्थर भी पिघलाती है बेटी । दो कुलो को तारती है बेटी , ससुराल में रह कर मायका भी निभाती है बेटी । हाल माँ बाप का लेने बेटा पहुँचे न पहुँचे, सबसे पहले आती है बेटी । प्रेम स्नेह ममता का सागर है बेटी , धरती सा है संबल इसमें , विपत्ति में भी साहस बढाती है बेटी । बेटों से ज्यादा प्यारी होती है बेटी , परायी है फिर भी सबकी दुलारी होती है बेटी ।।