सवाल पर सवाल जहन में आया रहता है

ये वक़्त हर वक़्त मुझे उलझाया रहता है


ठीक से बनती भी नहीं जहन और मन की

कौन है जो मेरे भीतर जंग लगाया रहता है


किसी मुस्कान का इंतजाम खुशी ग़र करती

जाता है बेकार जो ग़म का साया रहता है


आखिर किस किस के आगे सीना चीरें कोई

यहां हर कोई जहन में शक़ बिठाया रहता है


ये अच्छाई का नाटक कहीं और दिखाओ

यहाँ आदमी आदमी से घबराया रहता है

 

सूझती नहीं है मुझे अब कोई अच्छी बात

बुरा ख्याल ही मुझमें डेरा जमाया रहता है


वही झूठा बचता है आज की दुनिया में

अपनी आत्मा पर जो ज़ुल्म ढाया रहता है


हर किसी को नहीं मिलती है अच्छी जिंदगी

जिसको मिलती वो शिकायत लाया रहता है


-प्रियांशु सिंह