सारे ज़ुल्म ज़माने के बताएँगे ज़माने को

लिखेंगे कराहती कविता सुनाएँगे ज़माने को


ले जाएंगे ज़माने को ख्यालों के उन राहों पे

टूटी राह सपनों की दिखाएँगे ज़माने को


खुशी नजर नहीं आती उम्मीदें गई वीरानों में

देकर दर्द भरे आंसू रुलाएँगे ज़माने को


हम तो हैं उनमे से जो चुप रहने से थकतें हैं

जबतक समझ नहीं पाता समझाएँगे ज़माने को


डाटेंगे बेवकूफ़ों को बेवकूफ़ों की बेवकूफ़ी पर

इस बेपरवाह ज़माने से बचाएँगे ज़माने को


हमे यूँ लेकर चले जाने का दम कहाँ यम में

आ कर याद ज़माने को सताएँगे ज़माने को


- प्रियांशु सिंह