ठहर के राह पर जीवन के

मुसाफिर मुस्कुराया है

एक हसीन चेहरा खिलखिलाता

उसको याद आया है


समय कि है पाबंदी कि

वो अब मुड़ नहीं सकता

जो छोड़ आया राहें अब

उनसे जुड़ नहीं सकता

बडे दिनों बाद उसने

खुदको तन्हा जो पाया है

समय से माँगकर

उस पल की तस्वीर लाया है

सफर को भूल गया कब का

खुद को खो दिया कहीं

बडे दिन बाद खुद को

ऐसे बेपरवाह जो पाया है

वही पुरानी गलती

नए सिरे से आजमाया है


ठहर के राह पर जीवन के

मुसाफिर मुस्कुराया है

एक हसीन चेहरा खिलखिलाता

उसको याद आया है


हर एक लम्हें को

वो चेहरा सुहाना बना देता

जो मुस्कान हों उसपे

सारे गम भूला देता

वैसे तो कई बहाने हैं

दुनिया में जीने के

मगर उस पल कि कीमत

नहीं है कई महीने मे

फिर एक बार उस लम्हे

ने अपना जादू चलाया है

मानों बिछड़ा कोई अपना

पलभर को लौट आया है

बडे दिनों बाद किसी ने

दिल को उसके गुदगुदाया है


ठहर के राह पर जीवन के

मुसाफिर मुस्कुराया है

एक हसीन चेहरा खिलखिलाता

उसको याद आया है


-प्रियांशु सिंह