होने लगें हैं दर्द मेरे जवां ऐसे ही

रहने लगा हूँ गुमसुम खामखां ऐसे ही


फ़ूलों से चेहरों पर बातें हैं काटों सी

चुभने लगा है सारा जहां ऐसे ही


क्या कहूँ किसी से हाल बदहाली का

उठती नहीं है मेरी जुबां ऐसे ही


गर मौत अंत है तो कोई बात नहीं

पर क्या आते-जाते हैं इंसाँ ऐसे ही


यूँ जो समंदरों को तड़पाया सूरज ने

रोता रहा है रातभर आसमां ऐसे ही


ये बातें हम से पूछा भी न किसी ने

फिर भी देता हूँ कुछ बता ऐसे ही


-प्रियांशु सिंह