चंपा का पेड़ कुछ झुक गया है सफ़ेद फूल पीले से पड़ गए हैं पत्ते भी झर से गए हैं पर जड़ें अब भी वैसी ही हैं आँगन में धुप अब कम आती है आसपास के घर कुछ ऊँचे हो गए हैं सर्दियों में ठण्ड भी ज़्यादा लगती है पर रसोई की आग में अब भी उतना ही ताप है चीज़ें भी बदल चुकी हैं अलमारियों ने संदूक की जगह ले ली हैं फ्रिज ने भी मटके की जगह ले ली हैं पर पीतल का वो बंटा आज भी सिलिंडर पर रखा जाता हैं कविता अब पोएम हो गयी हैं त्यौहार भी फेस्टिवल बन चुके हैं इंग्लिश क्लास और हिंदी आउट ऑफ़ क्लास हो गयी हैं पर हम अब भी घरों में अपनी ज़बान ही बोलते हैं क्योंकि भाषा चाहे बदल भी जाये पर जज़्बात तो वही हैं