टिमटिमाती रातों में चाँद जलता है
रौशनी के नाम पे अँधेरा सजता है
ऊँचे संगीत के नीचे चीखें दबती हैं
जाम के दाम पे खुशियां बिकती हैं
यहां के आलम में ही सुरूर है
यहां तो गलती पे भी गुरूर है
ये गाओं से भी पिछड़ा है
ये सोच में भी छितरा है
क्या कहूँ इसके बारे में?
ये चमचमाता हुआ मेरा शहर है
इसकी तो मेहरबानियों में भी केहर है.