गुनगुनाती धुप जब गर्म हो जाती है और सूरज कुछ जलाने सा लगता है तो आँखों के आगे वो चाँद के से टुकड़े तैरने लगते हैं जिन्हे दादी बताशे बताया करती थी जिनकी ठंडक भी एक मिठास लिए होती थी अब वो बताशे भी दादी जैसे हो गए हैं बस याद आते हैं, मिलते नहीं हाँ ढूंढने पर वो मिल भी जाते हैं जैसे दादी तस्वीरों में मिल जाती है जो सामने होती तो है, पर होती नहीं इसलिए बताशे नहीं मिठास ढूंढनी होगी जब मिठास मिलेगी तो दादी भी मिल जाएगी और जब बताशे मिल जायेंगे तो कल दोपहर चाँद भी उग जायेगा और फिर सूरज कभी नहीं जलाएगा.