जब धीरे से दरवाज़ा खुलता है और कुछ नंगे पाँव भीतर आते हैं वो चप्पल तो बहार रख छोड़ते हैं पर उम्मीदें साथ ले आते हैं तब मुझको ताज्जुब होता है की ऐसे भी घर बनता है   जब फटी बिवाई के भीतर कुछ-कुछ सीमेंट सा भरता है तब इक घर मज़बूती पाता है उस इक्कीस साल के युवक की हड्डी से लेंटर डलता है तब मुझको ताज्जुब होता है की ऐसे भी घर बनता है   जब मेरे पुराने कपड़ों से एक पिंजर सा तन ढकता है तब मुझको ताज्जुब होता है कि ऐसे भी घर बनता है   जब एक फुलझड़ी कि चरपर से एक चेहरा तो हँसता है और दूजे के गालों के गड्ढों में एक अंगारा जलता है तब मुझको ताज्जुब होता है कि ऐसे भी घर बनता है   जब लाख सफाई,लाख मिन्नतें कर भी ईश्वर न आता है और बस्ती की झुग्गी में भी एक दीप टिम-टिम लेहराता है तब मुझको ताज्जुब होता है की वहाँ तो ईश्वर आता है एक लड़ी ख़ुशी की लाता है और ऐसे भी घर बनता है