सीता की इस आधीनता का ख़त्म ये अध्याय हो 

मानसिक संवेदना का बस यही अभिप्रयाय हो 

अग्नि को ना हो समर्पित जानकी की साधना 

हो अगर पुरुषों में उत्तम “राम “ फिर क्यों मौन हो