सूर्य से छनी हुई
जो ऊष्मा भरी हुई
हैं धूप की ये रागिनी
परिक्रमा उतारती, समस्त देवलोक की
चमक दमक बिखेरती
उमंग साज़ छेड़ती
प्रसन्नता उमड़ पड़ी
जो वंदना सी प्रेम की
वृहद्द छाप छोड़ती, समस्त देवलोक की
तमस समस्त छिन गया
निकृष्ट भाव मिट गया
नवीन भाव ओढ़कर
नया प्रकाश फैल कर
है आरती उतारती, समस्त देवलोक की

