द्रौपदी की अस्मिता पर फिर हुआ आघात है 


दुष्ट दुर्योधन खड़ा फिर से लगाए घात है 


भीष्म की शैया स्वयं उलाहना ये दे रही 


पार्थ अब आगे बढ़ो हे कृष्ण तुम क्यों मौन हो 


सीता की इस आधीनता का खत्म ये अध्याय हो


मानसिक संवेदना का बस यही अभिप्राय हो 


अग्नि को ना हो समर्पित जानकी की साधना 


हो अगर पुरुषो में उत्तम राम फिर क्यों मौन हो 


हिमसुता का ना हो वर्णन अब किसी पर्याय में 


जो कहीं जुड़ता हो जा कर दम्भ के संकाय में 


दक्ष की पुत्री कहे ये “दक्षयानी “नाथ से 


खोल दो त्रिनेत्र शिव तुम अब कहो क्यों मौन हो