की अब इस बार मुझसे यूँ संभाले से न संभलेगा 

बड़ा तूफ़ान है माँ बस तेरे दामन से रुख लेगा 


की अब तो ताने मुफलिसी भी कस रही हम पर

मगर बुनियाद पक्की है असर कुछ भी नहीं होगा 


न जाने कितनी सारी गर्मियां आकर चली गयीं 

वो कच्चे आम के पन्नो से रोशन घर नहीं होगा 


मेरे जख्मो पे लगी पट्टियां खुलने लगी हैं क्यों 

तुम्हीं दे दो दवा मुझको जख्म ये कम नहीं होगा 


वो दरवाज़े दरख्ते खिड़कियाँ अब भी बुलाते हैं 

मेरी  माँ के बिना वो घर मगर अब घर नहीं होगा ...........मेरी माँ के बिना वो घर मगर अब घर नहीं होगा 


(आम का पना)