मैं बादशाह था मेरे बचपन को ना छेड़ो लोगों
सर पे माँ बाप का साया ही सुकूँ देता है
कमाई दौलत भी अब तो सबर नहीं देती
कल के सिक्कों से ही दिल को सुरूर होता है।।
वो मकां नहीं अब ही मेरा घर है सुन लो
उसके जालों की नुमाइश तुम कभी नहीं करना
मेरे रहते कोई फूल न मुरझायेगा
उस बागीचे की तरफ भूल कर भी रुख नहीं करना।।
वो दीवारें वो बागीचे उन्ही घरौंदों में
दिल वहीँ छोड़ आयी हूँ किसी कोने में
अब तो नासूर सा ये ज़ख्म सदा रहता है
मेरा बचपन अभी ज़िंदा है ये भरम रहता है।।
वो उन दुआओं की नेमत सी है की अब भी सुन लो
मेरे दामन पे कोई दाग का निशाँ भी नहीं
ज़माने भर को तो ये अस लगी रहती है
बुरी नज़र का मगर हम पे असर ख़ास नहीं ।।
वो जन्नत में नहीं अब ही यहीं रहते हैं सुन लो
उन दराज़ों की सफाई में कसर नहीं रखना
मेरे जाने के रोज़ की यही गुज़ारिश है
मेरी मिट्टी को मेरी रूह से अलग नहीं करना।।

