जब लगने लगे अँधेरा सा
मन घबरा जाये थोड़ा साजब धरती करुण करे कृन्दन
अम्बर से उठे कोई रुदन
जब सारे तारे टूटे हों
और सारे अपने रूठे हों
तब भी अफ़सोस नहीं करनाठहरो तो हाँ, पर मत रुकना
सुस्ता लो , थोड़ा मौन धरोआगे चलने पे गौर करो
देखो उन नन्ही कलियों को
चढ़ती गिरती उन किरनों कोजब शाम हुई वो डूब गयीं
कच्ची कलियाँ भी रूठ गयीं
फिर से अगला दिन आएगा
फिर सूरज तमस हटाएगा
ये अंधियारे डरवाते हैं
अपनी पहचान छुपातें हैं
हो रात जो कितनी भी गहरी
अगली सुबह फिर आती है
फिर से खिलती है कली नयी
और फूल नया बन जाती है
अगली सुबह फिर आती है अगली सुबह फिर आती है

