हर एक यथा सन्दर्भ में, मैं स्वयं का अंतर्द्वंद हूँ |
अपने ही छंद में बंद मैं, स्वयं-कहा स्वच्छंद हूँ||
गद्य में मैं, पद्य में मैं,हर कथा का सार हूँ |
मैं ही मैं से न मिली, तो मैं ही अपनी हार हूँ ||
प्रेम पथ की जीत मैं, तो द्वेष का मैं दंड हूँ |
अपने ही छंद में बंद मैं, स्वयं-कहा स्वच्छंद हूँ ||
परम्परा का प्राण मैं, नयी रीत का प्रारम्भ हूँ |
वेदना की करुण व्यथा, मैं नए गीत का आरम्भ हूँ ||
शनैः शनैः जो रस घुले, उस पुष्प का मकरंद हूँ |
अपने ही छंद में बंद मैं, स्वयं-कहा स्वच्छंद हूँ ||
छद्म-आडम्बर लिप्त मैं, और सत्य का सत्कार भी |
माया मोह युक्त मैं, और निर्विकार विचार भी ||
शिव का रौद्र रूप मैं, वीभत्स हूँ प्रचंड हूँ |
अपने ही छंद में बंद मैं, स्वयं-कहा स्वच्छंद हूँ ||
साथ और सहयोग मध्य, छिपा हुआ मैं स्वार्थ हूँ |
अर्थ और परमार्थ मध्य, अमिट खड़ा यथार्थ हूँ ||
व्यथित हूँ, द्रवित हूँ , निश्छल आनंद हूँ |
अपने ही छंद में बंद मैं, स्वयं-कहा स्वच्छंद हूँ ||
उस तरु की डाल मैं, जो स्वयं फल से झुका |
भीष्म की वो स्वांस मैं, वक़्त जो बांधे रखा ||
कृष्ण का उपदेश मैं,और अर्जुन का द्वन्द हूँ |
अपने ही छंद में बंद मैं, स्वयं-कहा स्वच्छंद हूँ ||


