तुम ख़ूबसूरत हो ज़िन्दगी…
"तुम ख़ूबसूरत हो"
यह लिखने के लिये
मैंने स्याही घोली और
कागज के एक टुकड़े पर
लिखा पहला शब्द "ज़िन्दगी"।
ज़िन्दगी.....
मैं तुम पे एक कविता लिखना चाहती हूँ,
ग़र इज़ाजत दो तो मैं लिखूं ...
कभी रो कर मुस्कुराते है, तो कभी मुस्कुरा के रो जाते हैं,
तुझे पाने की ज़द्दोजह में रोज ख़ुद को इतना जलाते है,
फिर भी उस बची राख में एक क़तराभर ही तुझे पाते है।
तुम मसालेदानी-सी हो, ज़िन्दगी...
तीखे, मीठे, कसेले, नमकीन
ना जाने कितने ही स्वाद,
कितने ही रंग, कितनी खुशबू लिए बैठी हो;
तुम किसी चित्रकार की कैनवास पर उकेरी गयी कृति हो,
अस्त-व्यस्त, कोलाहल से भरी, फिर भी कितने करीने से
भावों से ख़ुद को सजाये बैठी हो।
ज़िन्दगी....
ख़ुद को पाने और दुनिया को पा जाने के
सफर के खर्चें में, सिक्के भर का ही मुनाफ़ाह तुम!
ताजमहल-सी नायाब, या
किसी खंडहर में दफ़न अनकहे जज़्बे-सी,
दोनों ही सूरतों में मुक़म्मल इश्क-सी बेमिसाल हो तुम।
कौनसे रंग के लिबास पहनती हो तुम..ज़िन्दगी
क्या कभी कोई ख़्वाब भी देखती हो तुम!
प्रेमिका के ठंडे हाथो की तपन-सी हो, या
धूप में तपते किसी किसान की अपनी
लहलहराती फसलों को देख, उसके
कलेजे में पड़ी ठंडक-सी हो तुम!
कुछ भी कहो...बड़ी महँगी हो तुम।
ज़िन्दगी....तुम ख़ूबसूरत हो,
ग़र इज़ाजत दो तो मैं लिखू, एक कविता तुम पे,
जो एक सफर तय करने के बाद किसी मोड़ पर
मुझे तुम तक पहुंचाएगी।
-प्रियंका कंसारा


