बांध दिया ना आज

फिर इस 'सिस्टम' के कुचक्र में तूने मुझे

फिर रोक दिया ना मेरे बढ़ते कदमों को

हौसलों को, इरादों को

जकड़ लिया ना मेरे पैरों को , बेबस्ता


अरी तू है कौन?

और वो भी इतनी मज़बूत

क्या, क्या नाम क्या दूं तुझे?


'जी हुजूरी' या दर्द की मारी बेबस 'चुप्पी '

भ्रष्टाचार तो कह नहीं सकती तुझे,

वो तो तेरे लिए बहुत छोटी-सी उपाधि होगी

हां, चरमराती लाचार 'रीड की हड्डी'

यही सही रहेगा!

तुझ जैसी भयंकर डायन के लिए,

जो जलाती है लोगों की आत्मा,

जो भूनकर खा जाती है रसीले गठीले शरीर को

जो पिघला देती है अपनी पापी तपिश से, इंसान के जज़्बे को


उफ़, कितनी घिनौनी है तू!


लेकिन तेरे इस घिनौनेपन से मोहब्बत भी है कुछ लोगों को

वो जिनकी जेबे गरम हैं,

मुंह में मीठे झूठे अल्फ़ाज़,

दारुण असत्य की परत से सजी चमकती खोखली आंखें,

जर्जर हौसले,

और एकाध खाली सुनसान जगह में समाए कांपते सच्च,

दबे कुचले आत्मसम्मान वाले बहुत इश्क फरमाते है तुझसे

और तू भी तो भर - भर के अपना अंग अंग परोसती है उन्हें।

कैसा काला शून्य है तू?


ज़ालिम है , दर्द देती है

कुचलती है.

तू पापिन है


फिर मात खा गया ना

आज मेरे सच्च का आयना

बना दिया ना तूने उसे

एक घिस्सा पीटा ढोकला

रुला दिया ना तेरे खिलखिलाते चेहरे ने मुझे

जिसकी चीख तेरे जश्न में दफ़न हो गई

बहुत रोई मैं, बहुत चिल्लाई

सिसकती रही, गुहारें लगाई

नहीं सुना तेरे प्रेमियों ने मुझे

फिर अधूरा कर दिया ना तूने मुझे


" डायन" !


-प्रियंवदा