यूँ तो कहने को बहुत कुछ है,
बुरा छोड़, अच्छा भी कुछ है।
मैं ये नहीं कहती कि मेरे पास सब कुछ है,
पर ख़ामियों के अलावा,
ख़ूबियाँ भी कुछ हैं।
फिर क्यों हर बार वही बातें दोहरानी,
“बुरा तो नहीं मानोगे?” कहकर
बस मेरी कमियाँ ही गिनानी?
अरे, कभी तो ये चश्मा उतारो जानी,
क्या पता, नज़र आए
कोई अनदेखी कहानी।

