हम झुलते रहे किताबों के बीच,
अल्फ़ाज़ दुआ बन उड़ गए।
रंग थे जो संभाल कर रखे,
वक़्त की धूप में सूख गए।
घुँघरू सारे बिखर गए,
सुर पता नहीं किधर गए।
सब दे रहे थे शाबाशी
उन चंद आँकड़ों के लिए,
जो दिल को बंजर कर
सुकून मेरा ले गए।
माना, इन आँकड़ों ने
चेहरे पर रौनकें सजा दीं,
पर जो मुस्कुरा रहा है आईने में,
वो शख़्स मैं तो नहीं?

