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जब तुम बैठो समीप

फूल-पत्तियाँ झर गए

उग आयी अब झाड़

मन-उपवन सूना भया

तुम बिन सब उजाड़। 


नहीं भावे मयूर-नृत्य

ना कोयलिया की कूक

खीर भी खारी लगे

मोहे नहीं लागे भूख। 


पास तुम्हारे चली आऊं

तोड़ दूँ जग की रीत

हो

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