अब भी लिखती हूँ अश'आर मगर's image
692K

अब भी लिखती हूँ अश'आर मगर

अब भी लिखती हूँ अश'आर मगर

पहले जैसा असर नहीं होता 


तुझसे मिलती थी तो जन्नत लगता था 

तेरी गैर-मौजूदगी में ये शहर, वो शहर नहीं होता 


लगी रहती हूँ किसी-न-किसी उधेड़-बुन में 

तुझे सोचे बगैर मेरा दिन पूरा नहीं होता 


यू तो नियामतें हज़

Read More! Earn More! Learn More!