आखिर मै भी तो किसी की बेटी थी,
तो क्यों न मुझे सम्मान दिया,,
क्या मुझसे पाप हुआ कोई,
या वधु होने का उपहार दिया,,
जब किया नहीं मैंने कुछ भी,
क्यों इतना बड़ा अन्याय हुआ,,
क्या यही था मेरी किस्मत में,
जो यूं विश्वास घात किया,,
क्यों जला दिया मुझको ऐसे,
क्यों इतना भी नहीं तरस किया,,
मैं भी तो किसी की बेटी थी,
मुझको भी किसी ने जनम दिया,,
अपने हृदय के टुकड़े को ,
स-सम्मान विदा भी किया,,
पैसों के इतने लोभी थे तुम,
जो जीवित मृत न ज्ञात किया,,
क्यों तुम्हें दया भी नहीं आई?
मुझ जैसी अबला नारी पे!
मैंने भी पुष्प संजोये थे,
अपने जीवन की क्यारी में,,
क्यों राख किया उन्हें इक पल में?
क्यों मुझे जला कर मार दिया??
मैं भी तो किसी की बेटी थी,
तो क्यों न मुझे सम्मान दिया,,
ये लोग बड़े ही मूढ मति,
क्या इन्हें समझ नहीं आता है??
इतिहास गवाह इस बात का है,,
जो नारी का अपमान करे,
वो कहाँ चैन ,सुख पाता है ।।


